Sunday, May 8, 2016

कुर्सी रामायण 
-हनवंत मल लोढ़ा




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कुर्सी के सब भूखे हैं , कुर्सी के सब प्यासे ,
कुर्सी - कुर्सी कर रहे , हथियाने में लागे। 
कुर्सी पीछे फिरत है , कुर्सी के ही आगे ,
जहां - जहां कुर्सी दिखे , पीछे - पीछे भागे। 
कुर्सी के पीछे सओत हैं , कुर्सी पीछे जागे ,
कुर्सी हाथ नहीं आत तो , दंगा - फसाद कर लागे। 
कुर्सी के सब मीत है , कुर्सी के सब चमचे ,
कुर्सी के आगे गात है , कुर्सी के आगे नाचे। 
कुर्सी के सब चोर हैं , और काम के चोर ,
जब तक कुर्सी बलवान , कुर्सी जात कामचोर। 
कुर्सी जब तक पास में , तब तक कोतलघोडे ,
कुर्सी गई हाथ से , और हो गए ढोलीेघोडे। 
कुर्सी जब तक पास में , तब तक हर कोई लट्टू ,
कुर्सी गई हाथ से ,रहे न गट्टू - मिट्टू। 
कुर्सी तब तक आप हैं ,
और तब तक जग के बाप ,
कुर्सी गई हाथ से और छकड़ी भूल जात। 
कुर्सी पाने हेतु सब , कर लेते हथकंडे ,
हड़ताल - भूख  हड़ताल कर खा लेते है डंडे। 
कुर्सी हेतु वोट हैं , कुर्सी हेतु नीट ,
जैसे कुर्सी जात हैं , बड़े - बड़े  भी रोत। 
कुर्सी से सब होत है , भाषण , चाटन , उदूघाटन ,
कुर्सी से माला पहिने , और कराय अभिन्दन। 
कुर्सी खातिर बेचते , निज , जमीर स्वाभिमान ,
वैल्थ , वुमेन , वाइन अजमाय , पाते मान - सम्मान। 
कुर्सी खातिर युद्ध हैं , और बुरे परिणाम ,
कुर्सी खातिर कटे , लड़े , मरे , विश्व युद्ध अंजाम। 
कई कवि 'हनवंत' जगत में यदि कुर्सी ना होती ,
न होते लाखों बच्चे अनाथ और 
ना इतनी विधवाएं रोतीं। 


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