एक कवि की अभिलाषा
-हनवन्त मल लोढ़ा
नहीं चाहिए हीरे पन्ने ,
ना सोने चांदी के थाल ,
नहीं चाहिए माणक मोती , ना कोई नौलखा हार ,
नहीं चाहिए महल मोटरें ,
ना राजाओं के से धाम ,
नहीं चाहिए वाह -वाह मुझको ,
ना कोई कीर्ति और नाम ,
नहीं कमल परियों के खातिर ,
नहीं अप्सराओं से है काम ,
नहीं जगह ये सुंदरियों की ,
ना मोटे लोगों के नाम,
सखा संबंधियों से ना लेना ,
ना कोई गति अविराम ,
सच्ची - सच्ची बात कह सकूँ ,
इतना ही है मेरा काम ,
जन जन के दुख को मैं हर लू ,
जन जन को मैं रिझा सकूँ ,
दीन दुखी का जग रौशन कर ,
दुखियारे को हंसा सकूं ,
बात कहूं इतनी सच्ची की ,
सिंहासन भी डोल उठे ,
दबा हुआ दुखियारा भी ,
शेरों की बोली बोल सके ,
कविता के अमृत की बूंदे ,
हर मानव को बुला सके ,
मुर्दों में भी जान फूंक दें ,
गिरे हुओं को उठा सकें ,
कलम चले तलवार की भांति ,
देशद्रोही को मिटा सकूं ,
आजादी के दीवानों को ,
हिम्मत पूरी बंधा सकूं ,
देश के खातिर ही लिखूं ,
और देश के खातिर ही बोलूं ,
गीत देश के ही गा गाकर ,
सब के मन को मैं मोह लूं ,
जीऊं सत्य - अहिंसा खातिर ,
मानवता को जगा सकूं ,
हरि चरणों में आपर्ति होकर ,
खुद को भी मैं भुला सकूं।
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