Tuesday, May 10, 2016
एे नये साल तू मन को जीत।
ऐ नये साल तू मन को जीत
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तू मन को जीत ,
जीव जगत के सभी सुखी हों ,
सब के मन में अनंत खुशी हो ,
सब के मन में अनंत ही प्रीत
एे नये साल तू मन को जीत।
प्राकृतिक विपदा ना आवे ,
कोई देव प्रकोप ना सताये ,
सुन्दर हो जीवन संगीत ,
एे नये साल तू मन को जीत।
ना तो जग में अनावृष्टि हो ,
ना ही कहीं अतिवृष्टि हो ,
ना कोई होवे भयभीत ,
एे नये साल तू मन को जीत।
आतंकों का नाम ना होवे ,
जात-पांत का काम ना होवे ,
रण-भेरी का ना बजे संगीत ,
एे नये साल तू मन को जीत।
नव वर्ष तू महान हो।
नव वर्ष तू महान हो
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ऐसी ही तेरी दुंदुंभी ,
जैसी न हो अब तक बजी ,
ख़ुशी का अभिप्राय हो,
नव वर्ष तू महान हो।
चहूं और सुख की वर्षा हो,
न कहीं भी गम की चर्चा हो ,
हर तरफ सुखी इंसान हो,
नव वर्ष तू महान हो।
आतंक हो न दंगे हों ,
झगड़े न कोई पंगे हों ,
ईश्वर में सब का ध्यान हो ,
नव वर्ष तू महान हो।
मम देश नित आगे बढ़े ,
न हिंसा का कोई रंग चढ़े ,
दुनियां में उसका मान हो ,
नव वर्ष तू महान हो।
सब काम नित अपना करें ,
सब दीन दुख नित हरे ,
बस शान्ति का पैगाम हो ,
नव वर्ष तू महान हो।
न काल हो न बाढ़ हो ,
न भूकम्प की कोई राड़ हो ,
बस प्रकृति का वरदान हो ,
नव वर्ष तू महान हो।
तांडव न हो महामारी का ,
न विभिषिका हो बीमारी का ,
सुरक्षित सब की जान हो ,
नव वर्ष तू महान हो।
फूंक दे तू प्राण सब में ,
फूंक दे तू जान सब में ,
अनूठी आन - बान हो ,
नव वर्ष तू महान हो।
Sunday, May 8, 2016
कुर्सी रामायण
-हनवंत मल लोढ़ा
कुर्सी के सब भूखे हैं , कुर्सी के सब प्यासे ,
कुर्सी - कुर्सी कर रहे , हथियाने में लागे।
कुर्सी पीछे फिरत है , कुर्सी के ही आगे ,
जहां - जहां कुर्सी दिखे , पीछे - पीछे भागे।
कुर्सी के पीछे सओत हैं , कुर्सी पीछे जागे ,
कुर्सी हाथ नहीं आत तो , दंगा - फसाद कर लागे।
कुर्सी के सब मीत है , कुर्सी के सब चमचे ,
कुर्सी के आगे गात है , कुर्सी के आगे नाचे।
कुर्सी के सब चोर हैं , और काम के चोर ,
जब तक कुर्सी बलवान , कुर्सी जात कामचोर।
कुर्सी जब तक पास में , तब तक कोतलघोडे ,
कुर्सी गई हाथ से , और हो गए ढोलीेघोडे।
कुर्सी जब तक पास में , तब तक हर कोई लट्टू ,
कुर्सी गई हाथ से ,रहे न गट्टू - मिट्टू।
कुर्सी तब तक आप हैं ,
और तब तक जग के बाप ,
कुर्सी गई हाथ से और छकड़ी भूल जात।
कुर्सी पाने हेतु सब , कर लेते हथकंडे ,
हड़ताल - भूख हड़ताल कर खा लेते है डंडे।
कुर्सी हेतु वोट हैं , कुर्सी हेतु नीट ,
जैसे कुर्सी जात हैं , बड़े - बड़े भी रोत।
कुर्सी से सब होत है , भाषण , चाटन , उदूघाटन ,
कुर्सी से माला पहिने , और कराय अभिन्दन।
कुर्सी खातिर बेचते , निज , जमीर स्वाभिमान ,
वैल्थ , वुमेन , वाइन अजमाय , पाते मान - सम्मान।
कुर्सी खातिर युद्ध हैं , और बुरे परिणाम ,
कुर्सी खातिर कटे , लड़े , मरे , विश्व युद्ध अंजाम।
कई कवि 'हनवंत' जगत में यदि कुर्सी ना होती ,
न होते लाखों बच्चे अनाथ और
ना इतनी विधवाएं रोतीं।
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नव वर्ष इतना करना
-हनवन्त मल लोढ़ा
हर पेट को तू भरना ,
हर तन को तू ढकना ,
हर घर को तू नमना ,
नव वर्ष इतना करना।
हर दीन का दुख हरना ,
हर दर्द की दवा करना ,
हर मांग को तू भरना ,
नव वर्ष इतना करना।
देश में हो खुशाहाली ,
हर घर मने दीवाली ,
बहे दूध घी का झरना ,
नव वर्ष इतना करना।
आतंक न बढ़ने पाये ,
कोई देवी जल न जाये ,
हो दहेज का ना धरना ,
नव वर्ष इतना करना।
बहे प्रेम की यों गंगा ,
न हो सम्प्रदायी दंगा ,
न पड़े किसी को डरना ,
नव वर्ष इतना करना।
महंगाई बढ़ न पाये ,
महामारी भी न आये ,
तू अमन चैन करना ,
नव वर्ष इतना करना।
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Saturday, May 7, 2016
एक कवि की अभिलाषा
-हनवन्त मल लोढ़ा
नहीं चाहिए हीरे पन्ने ,
ना सोने चांदी के थाल ,
नहीं चाहिए माणक मोती , ना कोई नौलखा हार ,
नहीं चाहिए महल मोटरें ,
ना राजाओं के से धाम ,
नहीं चाहिए वाह -वाह मुझको ,
ना कोई कीर्ति और नाम ,
नहीं कमल परियों के खातिर ,
नहीं अप्सराओं से है काम ,
नहीं जगह ये सुंदरियों की ,
ना मोटे लोगों के नाम,
सखा संबंधियों से ना लेना ,
ना कोई गति अविराम ,
सच्ची - सच्ची बात कह सकूँ ,
इतना ही है मेरा काम ,
जन जन के दुख को मैं हर लू ,
जन जन को मैं रिझा सकूँ ,
दीन दुखी का जग रौशन कर ,
दुखियारे को हंसा सकूं ,
बात कहूं इतनी सच्ची की ,
सिंहासन भी डोल उठे ,
दबा हुआ दुखियारा भी ,
शेरों की बोली बोल सके ,
कविता के अमृत की बूंदे ,
हर मानव को बुला सके ,
मुर्दों में भी जान फूंक दें ,
गिरे हुओं को उठा सकें ,
कलम चले तलवार की भांति ,
देशद्रोही को मिटा सकूं ,
आजादी के दीवानों को ,
हिम्मत पूरी बंधा सकूं ,
देश के खातिर ही लिखूं ,
और देश के खातिर ही बोलूं ,
गीत देश के ही गा गाकर ,
सब के मन को मैं मोह लूं ,
जीऊं सत्य - अहिंसा खातिर ,
मानवता को जगा सकूं ,
हरि चरणों में आपर्ति होकर ,
खुद को भी मैं भुला सकूं।
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